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NCERT class 10 English Literature Chapter 8 summary Mirror (notes) explained (translation) in hindi

Mirror Summary In English

Mirror defines itself
In this poem the mirror is itself the speaker. It says that it is silver and exact. It has no romantic preconceptions. Whatever it looks at, it absorbs within itself. Or whosoever looks at it, is absorbed within it. There is nothing like love or hatred in it. The mirror is neither cruel, nor indifferent. It is only truthful. It has four corners. In its characteristics, it can be called the eye of the little god.

Its place in the house
The place of the mirror is the wall on which it hangs. The wall has grown pink and speck¬led like it with times. The wall has become a part of the mirror. But faces and darkness separate both of them.

 

Woman’s reaction in looking at it
When the woman looks into it, she searches for what she once had been in her youth. That way the mirror is like a lake. But the mirror reflects back what she has become at present. She starts weeping over her lost youth and beauty. She sheds a few tears and moves her hands in sadness. She looks each morning into the mirror to see herself. She, in fact, searches her beauty of young age in it. In that instant faces and darkness separate the wall from the mirror.

Woman’s conclusion about herself
That woman has grown into an old woman from a young girl once. She rises towards her day like a terrible fish. It means that she recognises that she is no longer young and beautiful and feels sad.

Mirror Summary In Hindi

शीशे का स्वयं का वर्णन
इस कविता में शीशा स्वयं ही वक्ता है। यह कहता है कि यह चाँदी है और सही (सटीक) है। इसके अन्दर कोई रोमान्चक पहले के (पूर्व) विचार नहीं हैं। जो कुछ यह देखता है उसे अपने अन्दर समा लेता है। या जो कोई भी इसमें देखता है वह इसके अन्दर समा जाता है। इसमें कोई प्यार या घृणा जैसी चीज नहीं है। शीशा न तो निर्दयी है न ही उदासीन। यह तो केवल सत्यवादी ही है। इसके चार कोने हैं। इसकी विशेषताओं में इसे छोटे से देवता की आँख कहा जा सकता है।

घर में इसका स्थान
शीशे का स्थान वह दीवार है जिस पर यह टंगा रहता है। समय के साथ शीशे की तरह दीवार गुलाबी हो गई है और निशानों से भर गई हैं। दीवार शीशे का भाग हो गई है। परन्तु चेहरे और अन्धेरा उन दोनों को अलग-अलग कर देते हैं।

महिला की इसमें देखने से प्रतिक्रिया
जब महिला इसमें देखती है तो वह स्वयं को ढूंढती है जब कभी वह युवावस्था में थी। उस तरीके से शीशा एक झील की तरह से है। परन्तु शीशा तो उसको वापस ऐसे दिखाता है जैसे वह इस समय हो गई है। वह अपनी युवावस्था और सुन्दरता के खोये जाने पर रोना आरम्भ कर देती है। वह कुछ आँसू बहाती है और उदासी में अपने हाथों को हिलाती है। अपने आप को शीशे में देखने के लिये वह हर सुबह शीशे में देखती है। वास्तव में वह इसमें युवा की सुन्दरता ढूँढती है। उस क्षण चेहरे और अन्धेरा शीशे से दीवार को अलग कर देते हैं।

महिला को स्वयं के बारे में निष्कर्ष
वह महिला किसी समय की युवा लड़की से अब वृद्ध महिला हो गई है। व्रह एक खतरनाक मछली की तरह अपने दिन की तरफ उठती है। इसका अर्थ है कि वह पहचानती है कि वह अब युवा और सुन्दर नहीं है और उदासी महसूस करती है।

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