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NCERT class 9 English Snapshot Chapter 7 summary Birth (notes) explained (translation) in hindi

Birth Summary In English

It was nearly midnight when Andrew Manson, the young doctor reached Bryngower. He found driller Joe Morgan waiting anxiously for him. Joe told Andrew that his wife, Susan, wanted his help and that too before time. Andrew went into his house, took his bag and left with Joe for number 12 Blaina Terrace.

Joe’s voice showed signs of strain as he told the doctor that he would not go in. He reposed full faith in Andrew. A narrow stair led up to a small bedroom. He found two women beside the patient. One was Mrs Morgan’s mother. She was a tall, grey-haired woman of nearly seventy. The other was a stout, elderly midwife. The old woman offered to make a cup of tea for the doctor. The experienced woman had realized that there must be a period of waiting.

Andrew drank tea in the kitchen downstairs. He knew he could not snatch even an hour’s sleep if he went home. He also knew that the case would demand all his attention. Although he was very worried and upset, he decided to remain there until everything was over. An hour later he went upstairs again. He noted the progress made, came down once more and sat by the kitchen fire. The old woman sat opposite him. His thought were filled with Christine, the girl he loved. He stared broodingly, into the fire and remained like this for quite long. He was startled when the old woman suddenly asked him not to give her daughter the chloroform. She feared that it would harm the baby. The doctor replied that the anaesthetic would not do any harm.

An hour passed. It was now dawn when the child was born, lifeless. As he gazed at the still form, a shiver of horror passed over Andrew. His face, heated with his own exertions, chilled suddenly. He was torn between his desire to attempt to make the child start breathing again, and his obligation towards the mother. She was in a desperate state. The dilemma was quite urgent. Instinctively, he gave the child to the nurse. He turned his attention to Susan Morgan. She lay collapsed on her side, almost pulseless and not let out of the effect of medicine to make her unconscious. Her strength was ebbing. He smashed a glass ampoule and injected the medicine. Then he worked severely to restore the soft and weak woman. After a few minutes of quick efforts, her heart strengthened. He saw that he might safely leave her.

Then he asked the midwife about the child. She made a frightened gesture. She had placed it beneath the bed. Andrew knelt down and pulled out the child. It was a perfectly formed boy. Its limp, warm body was white and soft as tallow. The head lolled on the thin neck. The limbs seemed boneless. The cord, hastily slashed, lay like a broken stem. The whiteness meant only one thing-unconsciousness caused by lack of oxygen.

His mind raced back to a case he had once seen in the Samaritan. He remembered the treatment that had been used. He instantly asked the nurse to get him hot water and cold water and basins. Then he snatched a blanket. He laid the child on it and began the special method of respiration. As soon as the basins arrived, he poured cold water into one basin and hot in the other. Then he hurried the child between the two. Fifteen minutes passed. Sweat ran into Andrew’s eyes. His breath came pantingly, but no breath came from the lax body of the child.

A desperate sense of defeat pressed on him. It was a quickly spreading hopelessness. The midwife and the old woman were watching him. He remembered the old woman’s longing for a grandchild which had been as great as her daughter’s longing for this child. All this seemed broken and useless now. The midwife remarked that it was a stillborn child. Andrew did not pay any attention to her.

He had laboured in vain for half an hour. He still persisted in one last effort. He rubbed the child with a rough towel. He went on crushing and releasing the little chest with both his hands. He was trying to get breath into that limp body. At last, the small chest gave a short, convulsive heave. Then another and another. Andrew redoubled his efforts. The child was gasping now. A bubble of mucus came from one tiny nostril. The limbs were no longer boneless. The pale skin slowly turned pink. Then came the child’s cry.

Andrew handed the child to the nurse. He felt weak and dazed. The room lay in a shuddering litter. He wrung out his sleeve and pulled on his jacket. He went downstairs through the kitchen into the scullery. His lips were dry. He took a long drink of water. Then he reached for his hat and coat. It was now five o’clock. He met Joe and told him that both were all right. Andrew kept thinking that he had done something real at last.

Birth Summary In Hindi

लगभग आधी रात को समय था जब युवा चिकित्सक, एन्ड्रयू मैन्सन बिंगावर पहुँचा। उसने छेद करनेवाले जोअ मॉर्गन को अपने लिये बेचैनी से प्रतीक्षा करते हुए पाया। जोअ ने एन्ड्रयू को बताया कि उसकी पत्नी सूसन को उसकी सहायता की आवश्यकता थी और वह भी समय से पहले। एन्ड्रयू अपने घर में गया, अपना बैग (थैला) लिया तथा जोअ के साथ 12, ब्लैना टेरेसा के लिए चल दिया।

जब जोअ ने चिकित्सक को बताया कि वह भीतर नहीं जायेगा तो उसके स्वर में तनाव के चिहन दिखाई दिए। उसने एन्ड्रयू में पूरा भरोसा रखा। एक तंग सीढी ऊपर एक छोटे से शयनकक्ष को जाती थी। उसने रोगी के पास दो महिलाओं को पाया। एक थी श्रीमती मॉर्गन की माँ। वह लगभग 70 वर्षीया, लम्बी, सफेद बालोंवाली महिला थी। दूसरी एक मोटी, बुजुर्ग दाई थी। बूढी स्त्री ने चिकित्सक के लिए एक कप चाय बनाने की पेशकश की। अनुभवी महिला ने समझ लिया था कि प्रतीक्षा करने की अवधि अवश्य रहेगी।

एन्ड्रयू ने नीचे रसोईघर में चाय पी। वह जानता था कि घर जाने पर भी वह एक घंटे की नींद भी नहीं ले सकता था। वह यह भी जानता था कि यह केस पूरा ध्यान चाहेगा। यद्यपि वह चिन्तित तथा परेशान था, उसने वहाँ तब तक रहने का निश्चय किया जब तक सब कुछ पूरा न हो जाए। एक घन्टे के पश्चात् वह फिर ऊपर गया। उसने प्रगति देखी एक बार फिर नीचे आया तथा रसोईघर में आग के पास बैठ गया। बूढ़ी महिला उसके सामने बैठ गई। उसके विचार उसकी प्रेमिको क्रिस्टीन के विषय में ओत-प्रोत थे। वह सोचता हुआ आग की ओर देखता रहा तथा काफी समय इसी प्रकार रहा। वह तब चौंको जब वृद्धा ने उसे अचानक उसकी बेटी को क्लोरोफार्म न देने को कहा। उसे भय था कि इससे बच्चे को हानि होगी। चिकित्सक ने उत्तर दिया कि बेसुध करने की औषधि से कोई हानि नहीं होगी।

एक घंटा गुज़र गया। भोर हो चुकी थी जब निर्जीव शिशु का जन्म हुआ। जब एन्ड्रयू ने इस निश्चल आकार को देखा तो भय की कंपकपी उस पर दौड़ गई। वह बच्चे को पुनः सांस लेने के लिए प्रयास कराने की अपनी इच्छा तथा उसकी माँ के प्रति अपने उत्तरदायित्व के बीच फैंस गया। वह अत्यन्त निराशाजनक स्थिति में थी। यह दुविधा अत्यन्त ज़रूरी थी। प्रवृत्तिवश, उसने बच्चे को नर्स को दे दिया। उसने अपना ध्यान सूसन मोर्गन पर लगाया। वह एक करवट के बल लेटी हुई थी, नाड़ी विहीन तथा बेहोश करनेवाली औषधि के प्रभाव से अभी मुक्त नहीं थी। उसकी शक्ति क्षीण होती जा रही थी। उसने एक दवा की शीशी तोड़ी तथा उसे सूई लगी दी। फिर उसने इस शिथिल महिला को पुनः स्वस्थ करने की भरसक चेष्टा की। कुछ मिनटों के तेज़ प्रयासों से उसका हृदय मज़बूत हो गया। उसने देखा कि वह उसे सुरक्षित छोड़ सकता था।

फिर उसने दाई से शिशु के विषय में पूछा। उसने भयपूर्ण मुद्रा बनाई। उसने इसे पलंग के नीचे रख दिया था। एन्ड्रयू झुका तथा उसने शिशु को बाहर खींचा। यह सुघड़ बना हुआ लड़का था। इसका ढीला, गर्म शरीर सफेद था तथा चर्बी की भाँति नर्म। सिर पतली गर्दन पर लुढ़का हुआ था। अंग हड्डीविहीन लगते थे। इसकी शीघ्रता से काटी हुई नाल एक टूटे तने की भाँति पड़ी थी। सफेदी का केवल एक ही अर्थ था-ऑक्सीजन की कमी के कारण हुई बेहोशी।

उसका दिमाग उस विगत प्रसूति के मामले की ओर गया जो उसने समरिटन में देखा था। उसे वह उपचार (इलाज़) याद आया जो प्रयोग किया गया था। उसने तुरन्त नर्स को ठण्डी तथा गर्म पानी तथा बर्तन लाने को कहा। फिर उसने एक कम्बल खींचा। उसने बच्चे को इस पर लिटाया तथा साँस देने का विशेष ढंग आरम्भ कर दिया। ज्योंही बर्तन आ गये, उसने एक बर्तन में ठण्डा पानी डाला तथा दूसरे में गर्म। फिर वह जल्दी-जल्दी इन दोनों में बारी-बारी बच्चे को डालता रहा। पन्द्रह मिनट बीत गये। पसीना बहकर एन्ड्रयू की आँखों में पहुँच गया। वह हाँफते हुए साँस ले रहा था, किन्तु बच्चे के ढीले शरीर से कोई सांस नहीं आई।

उस पर पराजय की एक निराशापूर्ण भावना छा गई। यह तेजी से फैलनेवाली निराशा थी। दाई तथा बूढी स्त्री उसे ध्यान से देख रही थी। उसे वृद्धा की नाती के लिये लालसा याद आई जो उतनी ही तीव्र थी जितनी उसकी बेटी की अपने बच्चे के लिये। अब यह सब व्यर्थ तथा टूटता हुआ लगा। दाई ने कहा कि बच्चा मृत उत्पन्न हुआ था। एन्ड्रयू ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया।

उसने आधे घंटे तक व्यर्थ परिश्रम किया था। उसने एक अन्तिम प्रयास जारी रखा। उसने बच्चे को एक खुरदरे तौलिये से रगड़ी। वह दोनों हाथों से उसकी नन्हीं छाती को दबाता तथा छोड़ता गया। वह उसके ढीले ढाले शरीर में सांस लाने का प्रयास कर रहा था। अन्त में इस छोटी सी छाती में एक संक्षिप्त, ऐंठने भरा उभार आया। फिर दूसरा फिर एक और। एन्ड्रयू ने अपने प्रयत्न दोगुने कर दिये। अब बच्चा हाँफ रहा था। उसके छोटे से नथुने से श्लेष्मा का एक बुलबुला आया। उसके अंग अब हड्डी रहित नहीं थे। पीली त्वचा धीरे-धीरे गुलाबी हो गई। फिर बच्चे की रोने की आवाज़ आई।

एन्ड्रयू ने शिशु को दाई को पकड़ा दिया। उसने महसूस किया कि वह कमज़ोर तथा व्यग्र (घबड़ाहट भरा) था। कमरे में सामान बेतहाशा रुप से बिखरा पड़ा था। उसने अपनी बाँह ऐंठ कर निचोड़ी तथा अपनी जैकेट को ऊपर खींच लिया। वह नीचे रसोईघर से होता हुआ बर्तनों के माँजने की कोठरी तक गया। उसके होठ शुष्क (सूखे) थे। उसने काफी देर तक पानी पीया। फिर उसने अपना टोप तथा कोट लिया। अब पाँच बज चुके थे। उसे जोअ मिला जिसको उसने बताया कि दोनों बिल्कुल ठीक थे। एन्ड्रयू यह सोचता रहा कि अन्त में उसके कुछ वास्तविक (असली) बात कर दी थी।

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