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Sanskrit translation of chapter 5 वृक्षः in hindi class 6

वृक्षः


पाठ परिचय (Introduction of Lesson)

इस पाठ में अकारान्त शब्द के प्रथमा तथा द्वितीया विभक्ति के रूप का प्रयोग आया है। प्रथमा विभक्ति का शब्द रूप कर्तापद के लिए और द्वितीया विभक्ति का रूप कर्मपद्‌ के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
यथा-
(i) ‘बालका: खेलन्ति’ वाक्य में ‘बालका:’ कर्तापद (subject) होने के कारण प्रथम विभक्त में है।
(ii) बालका: पादकंदुक-खेल॑ खेलन्ति” वाक्य में “पादकंदुकखेलम्‌’ कर्मपद (object) होने के कारण द्वितीया विभवित में है।

हम सीख चुके हैं अकारान्त शब्द दो प्रकार के होते हैं। (i) पुल्लिंग तथा (ii) नपुंसकलिंग। दोनों के रूप नीचे दिए गए हैं।

पुँल्लिंगप्रथमा

द्वितीया

बालकः

बालकम्‌

बालकौ

बालकौ

बालकः

बालकान्‌

नपुंसकलिंगप्रथमा

द्वितीया

पुस्तकम्‌

पुस्तकम्‌

पुस्तके

पुस्तके

पुस्तकानि

पुस्तकानि

 

ध्यातव्यम्‌- नपुंसकलिंग शब्दों के रूप प्रथमा तथा द्वितीया विभक्ति में एक समान होते हैं।

 


(क) वने वने निवसन्तो वक्षा:।
वन वन॑ रचयन्ति वृक्षा: ||1||

शाखादोलासीना विहगा:।
ते: किमपि कूजन्ति वृक्षा: ||2||

सरलार्थ –

1. वृक्ष प्रत्येक वन में निवास करते/रहते हैं, इस प्रकार वृक्ष कई जंगल बनाते रहते हैं।

2. पक्षी शाखा रूपी झूले पर बैठे हैं मानों वृक्ष उनके माध्यम से कुछ-कुछ कूक रहे हैं अर्थात्‌ कह रहे हैं।


(ख) पिबन्ति पवनं जलं सन्ततम्‌।
साधुजना इव सर्वे वृक्षा: ||3||

स्पृशन्ति पादै: पातालं च।
नभ: शिरस्सु वहन्ति वृक्षा: ||4||

सरलार्थ –

1.वृक्ष हमेशा वायु और जल पीते हैं। सभी वृक्ष सज्जनों की भाँति होते हैं। अर्थात्‌ वे सज्जनों के समान हमारा उपकार करते हैं।

2.वृक्ष पैरों से (जड़ों से) पाताल को छूते हैं और सिरों पर आकाश को ढोते हैं। अर्थात्‌ वे महान हैं और अत्यधिक कार्यभार सँभालते हैं।


(ग) पयोदर्पणे स्वप्रतिबिम्बम्‌
कौतुकेन पश्यन्ति वृक्षा: ||5||

प्रसार्य स्वच्छायासंस्तरणम्‌।
कुर्वन्ति सत्कारं वृक्षा:। ||6||

सरलार्थ –

1. वृक्ष जल रूपी आईने में अपना प्रतिबिम्ब आश्चर्य/कौतूहल से देखते हैं।

2. वृक्ष अपने छाया रूपी बिछौने को फैला कर अर्थात्‌ बिछा कर (सबका) आदर-सत्कार करते है ।


 

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